नन्ही गिलहरी चीकू की प्यारी कहानी, जो बच्चों को मेहनत, समझदारी और दोस्ती की सीख देती है। रंगीन दृश्यों और सरल भाषा में सजी एक मनमोहक बाल कथा।
हरा-भरा जंगल

बहुत समय पहले की बात है। एक बहुत ही सुंदर और हरा-भरा जंगल था। उस जंगल में ऊँचे-ऊँचे पेड़ थे, जिनकी डालियाँ आसमान से बातें करती थीं। हर तरफ़ हरियाली थी। पक्षी चहचहाते थे, तितलियाँ रंग-बिरंगे फूलों पर मंडराती थीं और हवा में मीठी-सी खुशबू फैली रहती थी।
उसी जंगल के एक बड़े बरगद के पेड़ पर चीकू नाम की एक नन्ही गिलहरी रहती थी। चीकू बहुत ही प्यारी थी। उसकी पूँछ फूली हुई और मुलायम थी, जैसे रुई का गोला। उसकी आँखें बड़ी-बड़ी और चमकदार थीं, जिनमें हमेशा शरारत और खुशी झलकती रहती थी।
जंगल के सभी जानवर चीकू को बहुत पसंद करते थे। जब चीकू पेड़ की डालियों पर दौड़ती, तो सब मुस्कुरा उठते। वह सबकी आँखों का तारा थी।
खेल ही खेल

चीकू को खेलना सबसे ज़्यादा अच्छा लगता था। सुबह होते ही वह अपनी माँ को “टाटा” कहकर निकल पड़ती।
कभी वह डालियों पर उछलती-कूदती,
कभी पेड़ से पेड़ तक छलांग लगाती,
तो कभी अपने दोस्तों के साथ लुका-छिपी खेलती।
उसे समय का बिल्कुल ध्यान नहीं रहता था।
जब उसकी माँ प्यार से कहती,
“चीकू बेटा, सर्दियाँ आने वाली हैं। थोड़ा-थोड़ा खाना जमा कर लो,”
तो चीकू हँसते हुए कहती,
“अभी बहुत समय है माँ! पहले खेल लेते हैं।”
चीकू सोचती थी कि खेल ही सबसे ज़रूरी काम है। खाना जमा करना उसे बहुत बोरिंग लगता था। वह सोचती, “आज खेल लिया, कल जमा कर लेंगे।”
मौसम बदल गया

धीरे-धीरे दिन बीतने लगे। एक सुबह चीकू ने महसूस किया कि हवा ठंडी हो गई है। पेड़ों के पत्ते पीले होकर झड़ने लगे थे। जो डालियाँ पहले हरी-भरी थीं, अब थोड़ी सूनी लगने लगीं।
फल और मेवे भी कम होने लगे।
जंगल पहले जितना खुशहाल नहीं दिख रहा था।
चीकू ने चारों ओर देखा। उसे थोड़ी चिंता हुई, लेकिन फिर उसने सोचा,
“अभी क्या डरना, सब ठीक हो जाएगा।”
पर सच तो यह था कि सर्दी ने जंगल में दस्तक दे दी थी और खाने की कमी शुरू हो गई थी।
भूखी चीकू

एक दिन चीकू को बहुत तेज़ भूख लगी। वह खाने की तलाश में इधर-उधर दौड़ी।
उसने पेड़ की हर डाल देखी,
ज़मीन पर गिरे पत्तों को उलट-पलट कर देखा,
लेकिन कहीं भी खाना नहीं मिला।
चीकू थक गई।
उसकी आँखों में आँसू आ गए।
वह एक पेड़ के खोखले तने के पास बैठ गई और रोने लगी।
उसे अपनी माँ की बात याद आई।
उसे अपनी गलती समझ आने लगी।
अब खेलने का मन भी नहीं था।
समझदार सहेली

उसी समय चीकू को अपनी सहेली मीठू याद आई। मीठू शांत और समझदार गिलहरी थी। चीकू हिम्मत करके मीठू के घर पहुँची। मीठू ने उसे अंदर बुलाया। वहाँ बहुत सारा खाना जमा था। मीठू ने मुस्कुराकर कहा, “मैं रोज़ थोड़ा-थोड़ा जमा करती हूँ। इसलिए आज परेशानी नहीं है।” यह कहकर मीठू ने चीकू के साथ खाना बाँटा। चीकू को बहुत अच्छा लगा।
उसकी भूख भी मिट गई और दिल भी भर आया।
नई सीख

चीकू ने उस दिन एक बड़ी सीख ली।
उसने मन ही मन ठान लिया कि अब वह आलसी नहीं बनेगी।
“और मेहनत करेगी” अब चीकू रोज़ थोड़ा काम करती और थोड़ा खेलती। वह खुश भी थी और समझदार भी बन गई थी। उसकी माँ भी बहुत खुश हुई। अब चीकू जंगल में एक अच्छी मिसाल बन गई थी।
सीख:
समय पर किया गया छोटा काम, हमें बड़ी परेशानी से बचाता है।
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