एक बार का किस्सा है—
एक छोटा सा बच्चा था बबलू।
बबलू को कविताएँ पढ़ना बहुत-बहुत पसंद था।
वो रोज़ किताब खोलकर गाता था:
“चंदा मामा दूर के,
पकड़ न पाऊँ पूँछ के…”
पर जैसे ही मम्मी कहतीं—
“बबलू, थोड़ा लिख भी लो…”
बबलू तुरंत बोलता—
“नहीं मम्मी… मैं सिर्फ कविता पढ़ूँगा।
लिखना मुझे नहीं आता… और मैं लिखना नहीं चाहता!”
एक दिन स्कूल से लौटते समय
बबलू को एक चमकदार छोटा पेन मिला।
पेन खुद-ब-खुद नाच रहा था—
टप-टप-टप-टप!
बबलू ने पूछा,
“अरे! तुम कौन?”
पेन बोला,
“मैं हूँ जादू-पेन!
मैं कविता सुन सकता हूँ… और जादू कर सकता हूँ!”
बबलू खुश हो गया—
“सच्ची? तो मेरी कविता सुनो!”
बबलू ने जोर-जोर से कविता पढ़ी।
जैसे ही वह कविता पढ़ता,
पेन टिप-टिप करके चमकने लगता।
पेन बोला,
“बबलू, तुम्हें कविता बहुत आती है।
अब जरा लिखकर दिखाओ…”
बबलू बोला,
“न-न-न!
मैं नहीं लिख सकता। लिखना मुश्किल है!”
पेन ने धीरे से कहा,
“बबलू, तुम्हारी कविताएँ बहुत मीठी हैं।
अगर तुम एक शब्द भी लिख दोगे…
तो मैं जादू वाला फूल बना दूँगा!”
बबलू थोड़ा सोचकर बोला—
“ठीक है… एक ही शब्द लिखूँगा!”
उसने पेन पकड़ा।
धीरे… धीरे…
कॉपी में लिखा— “चाँद”
जैसे ही उसने लिखा—
पेन चमक उठा
और कॉपी के ऊपर एक छोटा-सा जादूई फूल उग आया!
बबलू हँस पड़ा—
“अरे! ये तो मजेदार है!”
पेन बोला,
“देखा?
तुम लिख सकते हो।
बस तुमको लगता था कि नहीं लिख पाओगे।”
अब बबलू ने रोज़
अपनी पसंद की कविता का एक-एक शब्द लिखना शुरू किया।
धीरे-धीरे…
वो शब्द मिलकर लाइनें बनने लगीं।
लाइनें मिलकर पूरी कविता बन गई।
मम्मी खुश हो बोलीं—
“बबलू बेटा, तुम तो बहुत सुंदर लिखते हो!”
बबलू कूदते हुए बोला—
“हाँ! मैं अब कविता पढ़ता भी हूँ और लिखता भी हूँ!
क्योंकि मेरे पास है— जादू-पेन!”
—
छोटी-सी सीख
जो बच्चे पढ़ सकते हैं, वे लिख भी सकते हैं।
बस थोड़ी हिम्मत चाहिए, जादू तो अंदर ही होता है।

Discover more from The Raghav Verse
Subscribe to get the latest posts sent to your email.