8 साल का अनिकेत पहले बहुत मुस्कुराने वाला बच्चा था,
पर कुछ समय से उसकी मुस्कान जैसे कहीं खो गई थी।
वजह थी—घर में हर छोटी बात पर डांट और मार।

सुबह, उसके हाथ से दूध गिरा।
पापा गुस्से से बोले—
“कुछ काम ढंग से नहीं कर सकता?”
अनिकेत के साथ दूध ही नहीं, उसकी हिम्मत भी फर्श पर गिर गई।

दोपहर, कॉपी में एक सवाल गलत था।
मम्मी बोली—
“इतना पढ़ाते हैं, फिर भी नहीं आता?”
और उसकी हथेली पर डंडा लगाया।
दर्द कुछ मिनट रहा… मगर मन में एक नई दरार बन गई।

शाम, खिलौने बिखरे थे।
पापा ने गुस्से में थप्पड़ मार दिया।
गाल का निशान थोड़ी देर में हल्का हो गया,
पर दिल पर पड़ी चोट हर घंटे गहरी होती गई।

धीरे-धीरे अनिकेत बदलने लगा —जो बच्चा सबसे ज़्यादा बोलता था, अब चुप रहने लगा।दोस्तों से दूर रहने लगा।गलतियाँ करने से डरने लगा।हर आवाज़ पर सहम जाता।
एक दिन टीचर ने उसे रोते देखा और पूछा—“क्या हुआ, अनिकेत?”अनिकेत ने टूटे शब्दों में कहा—“गलती करूँगा तो घर में बहुत दर्द मिलता है।”

टीचर समझ गईं कि सच कितना गहरा है।
उन्होंने पापा-मम्मी को बुलाया और कहा—
“आपका बेटा गलती से नहीं, आपसे डरता है।
डांट से बच्चे नहीं सुधरते, सिर्फ डर में जीना सीख जाते हैं।”
पापा-मम्मी की आँखें नम हो गईं।उन्होंने अनिकेत को कसकर गले लगाया।पापा बोले—“अब तुझे कोई दर्द नहीं लगेगा… न शरीर पर, न दिल पर।”
अनिकेत फूट-फूटकर रो पड़ा—ये आँसू डर के नहीं, राहत के थे।
🌟 सीख:
बच्चे पौधे की तरह होते हैं—
मार से नहीं, प्यार से बढ़ते हैं।
कई बार चोट शरीर पर नहीं, दिल पर लग जाती है…
और वो सालों तक नहीं भरती।
Discover more from The Raghav Verse
Subscribe to get the latest posts sent to your email.